
भारत में लगभग 635 आदिवासी समूह व उप-समूह हैं। इनमें 73 प्राचीन जनजातियां हैं। ये सब मिलकर आबादी का 8.2 प्रतिशत हिस्सा हैं। मध्य-व उत्तर-पूर्व भारत के सात राज्य आदिवासी बहुल हैं। आदिवासी इलाकों में आज भी प्राथमिक पेशा कृषि ही है। आदिवासी समुदाय की पहचान हैं- गरीबी, निरक्षरता, अल्प आय, खाद्य असुरक्षा, नागरिक सुविधाओं की कमी, बदतर शैक्षणिक सुविधाएं और बेरोजगारी।
डिजिटल माध्यम इन समुदायों के बीच की दूरी को कम करने में प्रभावी साबित हुआ है। पर यह तथ्य केंद्र व राज्य स्तरों के आदिवासी विकास कार्यक्रमों में गायब है। संविधान के आर्टिकल 275 (1) के तहत जनजाति उप-योजना विशेष केंद्रीय मदद की सुविधा देती है, ताकि आदिवासी विकास कार्यक्रमों में निवेश हो। 14 से भी अधिक आदिवासी शोध संस्थान उचित विभागों को इनपुट्स मुहैया कराते हैं। जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ उत्पाद और सेवा के स्तर पर स्थायी आय व आजीविका का माध्यम उपलब्ध कराता है।
इसी तरह, 19 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में 192 एकीकृत आदिवासी विकास परियोजनाएं और आदिवासी विकास संस्थाएं हैं। इनमें सूचना एवं संचार तकनीकों (आईसीटी) का अभाव है। निस्संदेह, आदिवासी लोगों को डिजिटल हुनर व शिक्षा की जरूरत है। ऐसे में, क्या हमें एक अलग योजना या कार्य, जैसे ई-ट्राइबल पॉलिसी या आईसीटी फॉर ट्राइबल एक्शन प्लान चाहिए? कार्बी आंगलोंग को देखते हुए यह ध्यान देना जरूरी है कि आदिवासियों का विकास इनके डिजिटल विकास के साथ ही पूरा होगा।

